Friday, March 19, 2021

चिड़िया

बचपन में 
मेरे आँगन में बहुत आती थी
याद है मुझे
ट्युब लाइट पर
रोशनदान पर 
तिनका तिनका लाकर घोसला बनाती थी
अपने बच्चों को
अपनी नन्ही चोंच से खाना खिलाती थी
बच्चों के पर निकलते ही
वे फुदकने लगते थे
कभी कभार नीचे गिर जाते थे
तब उन बच्चों को 
हम बच्चे 
आटा घोलकर खिलाया करते थे
उनकी माँ चिड़िया को बड़ा गुस्सा आता था
बच्चें बड़े हो उड़़ जाते थे
घोसलें खाली हो जाते थे
लेकिन आँगन में चिड़िया रोज आती थी
हम कविताएं भी चिड़ियों की गाते थे
खेल में भी चिड़िया होती थी
तोता उड़़, चिड़िया उड़ 
खेलकर अपना बचपन जीते थे
गुलजार था बचपन इन चिड़ियों से
लेकिन अब
न घोसले है, न आँगन है और ना ही चिड़िया
अब बचपन भी कहाँ गुलज़ार है

Monday, December 21, 2020

साढ़े पाँच मीटर

सुनो लड़कियों
तुम अगर थोड़ी कम लंबी हो 
तो मैं तुम्हे लंबा दिखा सकती हूँ
थोड़ी ज्यादा ही लंबी हो तो
संतुलन बना सकती हूँ
अगर थोड़ी सी मोटी हो, तो
चिंता न करो कतई
मैं तुम्हे पूरी तहजीब से तराश दूँगी
ग़र पतली हो कुछ ज्यादा ही तो
तुम्हारी दिखती हड्डियों को 
बड़ी ही कुशलता से छुपा दूँगी
बाकी रंग की तुम फिक्र ना रहो
गोरी हो चाहे काली
तुम बेमिसाल हो
लेकिन सुनो छोरियों
बेमिसाल हूँ मैं भी
मैं पहचान हूँ
मैं पूरी की पूरी संस्कृति हूँ
मैं जादू हूँ जो किसी को भी जादुई बना दे
मै कशिश हूँ
मैं नशा हूँ
मैं कमसिन हूँ
मैं खूबसूरत हूँ
यूँ तो मैं साढ़े पाँच मीटर का 
महज एक कपड़ा हूँ
पर इस कपड़े मे समेट लेती हूँ
इस पूरे देश की 
हर प्रांत की
हर घर की
सारी बातें
दादी नानी और माँ की खुशबू बसी है मुझमे
और सुनो लड़को
मुझमे है एक आँचल भी
जिसकी छांव तले तुम सब सुस्ताए हो
जानते हो कौन हूँ मैं
मैं साड़ी हूँ
फैशन के इस दौर में गर्व से खुद पर इतराती
हाँ....मैं साड़ी हूँ 

Thursday, January 30, 2020

अनुपस्थिति

मैं अब तोड़ना चाहती हूँ
उस अनवरत संवाद को
जो तुम्हारी अनुपस्थिति में
हुआ है तुमसे लागातार
क्योकि 
अब ये मुझे तोड़ने लगा है
बाहर आना है इस भ्रम से
कि तुम हो
बस, याद रखनी वही बातें
जो रुबरू कभी हुई थी
याद रखने है
जीवन के वही पाठ
जो तुमसे सीखे
या तुम्हारे
साहचार्य ने सिखाये 
जब तुम नहीं हो तो
स्वीकार करना
और जब हो, तो
टिमटिमाते उन तारों को देख मुस्कुराना
साफ आसमान में 
उस चाँद के दाग देखना
और 
मन ही मन बुदबुदाना
स्पष्टता ही जीवन है 
और
ये स्पष्ट है कि
तुम्हारा होना क्षणिक है, जबकि
न होना शाश्वत
शुक्रिया.....
तुम्हारा न होना भी 
मुझे कितना कुछ सिखाता है 
बस, इस न होने के होने को
हमेशा साथ पाऊँ 

Friday, July 1, 2016

संवाद

#बातचीत_करते_रहिये

           संवाद तभी तक बातचीत रहती है जब तक हम सहमती और असहमती में संतुलित बने रहते हैं अन्यथा असहमती अपने साथ क्रोध लेकर आती हैं और संवाद खत्म हो जाता हैं।ऩिदा फ़ाजली साहब ने सही फरमाया हैं...........
बात कम कीजे जहानत को छिपाते रहिये
अजनबी शहर है ये,  दोस्त बनाते रहिये
दुश्मनी लाख सही, ख़त्म  ना कीजे रिश्ता
दिल मिले ना मिले, हाथ मिलाते रहिये
ये तो चेहरे कि शबाहत हुई तस्वीर नही
इस पे कुछ रंग अभी और चढ़ाते रहिये
गम हैं आवारा अकेले में भटक जाता हैं
जिस जगह भी रहिये, मिलते मिलाते रहिये
जाने कब चाँद बिखर जाये जंगल में
घर की चौखट पे कोई दीप जलाते रहिये

         संवाद,दो लोगो को जोड़ता हैं और प्रसन्न जीवन के लिये ये एक आवश्यकता भी हैं लेकिन ये तभी तक बेहतर हो सकता है, जब तक वो निडरता से हो.... क्योकि कभी कभी सामने वाला अपनी बात अस्वीकारे जाने के डर से कह नहीं पाता जबकि कभी ऐसा भी होता हैं कि किसी को सिर्फ अपनी ही बात सही लगती हैं...... ऐसी स्थितियों में संवाद एकतरफा हो जाता हैं।
      आज के हालात में अक्सर ऐसा ही होता हैं फिर चाहे वो मैं हूँ या आप........ हम असहमती को स्वीकार नहीं कर पाते,हम जो भी सोचते है, उम्मीद करते हैं कि सामने वाला भी वैसे ही सोचे और उसका नजरिया बिल्कुल हमारी ही तरह हो। जैसे ही कोई हमारी बात से असहमत होता हैं,हम भड़क जाते हैं और इसे अपने सम्मान का हरण समझ बैठते हैं क्योकि असहमत से सहमत होना हमे आता ही नहीं हैं और हम आपा खो देते हैं।
        कोई कोई हमारी बात को जानबुझकर काटते हैं तो किसी की बात को हम बेवजह नकार देते हैं,कभी हम सोचते हैं कि सामने वाला शिक्षित नहीं हैं उसे अधिक पता नहीं होगा जबकि हकीकत यह हैं कि ज्ञान कभी डिग्रीयों का मोहताज नहीं हुआ......कभी हमारे बच्चें सोचते है कि हमे नये जमाने की बातें नहीं पता जबकि बच्चे नहीं जानते कि हमारे पास अनुभवों का वो पैमाना हैं जो नये जमाने को माप सकता हैं........... कभी पुरुष सोचते हैं कि महिला हैं,इन्हे क्या पता और ऐसा ही कुछ महिलायें सोचती हैं पुरुषों के बारे में............कभी बड़े शहरों वाले गाँव वालों को बेवकुफ समझते हैं तो कभी गाँव के लोग शहरी लोगो को असभ्य समझते है.......... कहने का मतलब यही है कि तारतम्य कही नहीं हैं..... जो संवाद लोगो में होना चाहिये वही नहीं हो पा रहा। किसी को सिर्फ अपना ही पक्ष रखना हैं तो कोई असहमती के डर से अपना पक्ष ही नहीं रख पा रहा हैं।
       फ़ाजली साहब के कितनी सटीक बात कही हैं---------
                               जिसे भी देखिये वो अपने आप में गुम है                                  ज़ुबां मिली है मगर हम-ज़ुबां नहीं मिलता
     जी हाँ, बिल्कुल सच हैं कि हमज़ुबां मिलना मुश्किल है और अगर मिल भी गया तो समझिये कि आपके प्रगति के रास्ते बंद हो गये सिर्फ अपने मन की बातें सुनते हुए आप कहाँ तक जा पायेगे....... इसलिये सफलता की राह पकड़िये और असहमती से सहमत होना सीखीये।
            चतुर नार को फिर से कुछ कहना हैं, शायद आपको पसंद आये

 1. सबसे पहले तो असहमती और विरोध में फर्क को समझे।
 2. विरोध का मतलब आपको नकारना हैं और आप कितने भी सही हो आपको नकारना तय हैं अत: इसे किसी भी हालत में स्वीकार नहीं करना चाहिये।
 3. असहमती का मतलब आपके किसी एक विचार को नकारना है और इसका खुले दिल से स्वागत करना चाहिये।
 4. अगर आपकी कोई बात सामने वाला नहीं मान रहा हैं तो धैर्य बनाये रखे और इसे मान सम्मान से तो कतई ना जोड़े।
 5. ध्यानपूर्वक समझने कि कोशिश करे कि असहमती की वजह क्या है ।
 6. अगर कही भी आपको लगता हैं कि हो सकता है आप गलत हैं तो तत्काल अपनी सोच पर लगाम लगाये और विनम्रतापूर्वक सामने वाले को अपना पक्ष रखने बोले।
 7. अगर सामने वाले से आप सहमत नहीं हैं तो तर्क सहित अपना पक्ष रखे और उसे समझने का मौका दे।
 8. हो सकता है कि सामने वाले का नजरिया अलग हो ,एक बार उसके नजरिये से देखने की कोशिश जरूर करे ,आपके ज्ञान में वृद्धि होगी।
 9. कई बार हम सामने वाले की बात गलत लगती हैं लेकिन डर की वजह से मौन रह जाते है और मौन का मतलब सहमती से ही होता हैं....... ऐसे मे कभी मौन ना रहे क्योकि ध्यान रखिये आप सिर्फ असहमती जता रहे हैं विरोध नही इसलिये निडरता से आवाज उठाये।
 10. असहमती को कभी भी दिल से ना लगाये,संवाद खत्म होने के साथ ही मस्तिष्क को आराम दे और गहरी साँस लेकर आगे बढ़े।
 11. याद रखे, असहमती भी होगी और विरोध भी होगा इसलिये आप जो भी बोले सोच समझ कर बोले और अनर्गल तो बिल्कुल ना बोले।
 12. हमारा मकसद हमारा नॉलेज बढ़ाना होना चाहिये ना कि किसी को नीचा दिखाना।
 13. हमे किसी से पर्सनल शिकायत रहती हैं इसका मतलब यह नहीं कि हम उसकी हर बात को गलत ठहरायेंगे,सोच बदले और आगे बढ़े।
 14. जरूरी नहीं कि मीठी बातें हमेशा सही हो और कड़वी बातें गलत..... बात का मर्म समझे।
             चतुर नार का कहना हैं कि ज्यादा नियम कानुनों में ना बंधते हुए हमेशा दिल खोलकर बातें करे क्योकि सोची समझी बातों से तो शह और मात का खेल खेला जाता हैं...... दिल खोलकर अगर हम दिल जीत ले तो क्या कहने..... अन्त में सबसे जरूरी बात जहाँ तक हो सके सच बोले आप हल्कापन महसूस करेगे.....कभी भी झुठ का बोझा ना लादे ☺️

Sunday, June 5, 2016

जी ले जरा



             "यूँ माना ज़िन्दगी है चार दिन की
             बहुत होते हैं यारों चार दिन भी"
     फ़िराक गोरखपुरी  के उपरोक्त शब्दों से मैं पुर्णतया सहमत हूँ.....
इन शब्दों को समझने के लिये हम एक कहानी का सहारा लेते हैं......
ज़िंदगी के 20 वर्ष हवा की तरह उड़ जाते हैं.! फिर शुरू होती है नौकरी की खोज.!
ये नहीं वो, दूर नहीं पास.
ऐसा करते 2-3 नौकरीयां छोड़ते पकड़ते,
अंत में एक तय होती है, और ज़िंदगी में थोड़ी स्थिरता की शुरूआत होती है. !

और हाथ में आता है पहली तनख्वाह का चेक, वह बैंक में जमा होता है और शुरू होता है... अकाउंट में जमा होने वाले कुछ शून्यों का अंतहीन खेल..!

इस तरह 2-3 वर्ष निकल जाते हैँ.!
'वो' स्थिर होता है.
बैंक में कुछ और शून्य जमा हो जाते हैं.
इतने में अपनी उम्र के पच्चीस वर्ष हो जाते हैं.!

विवाह की चर्चा शुरू हो जाती है. एक खुद की या माता पिता की पसंद की लड़की से यथा समय विवाह होता है और ज़िंदगी की राम कहानी शुरू हो जाती है.!

शादी के पहले 2-3 साल नर्म, गुलाबी, रसीले और सपनीले गुज़रते हैं.!
हाथों में हाथ डालकर बातें और रंग बिरंगे सपने.!
पर ये दिन जल्दी ही उड़ जाते हैं और इसी समय शायद बैंक में कुछ शून्य कम होते हैं.!
क्योंकि थोड़ी मौजमस्ती, घूमना फिरना, खरीदी होती है.!

और फिर धीरे से बच्चे के आने की आहट होती है और वर्ष भर में पालना झूलने लगता है.!

सारा ध्यान अब बच्चे पर केंद्रित हो जाता है.! उसका खाना पीना , उठना बैठना, शु-शु, पाॅटी, उसके खिलौने, कपड़े और उसका लाड़ दुलार.!
समय कैसे फटाफट निकल जाता है, पता ही नहीं चलता.!

इन सब में कब इसका हाथ उसके हाथ से निकल गया, बातें करना, घूमना फिरना कब बंद हो गया, दोनों को ही पता नहीं चला..?

इसी तरह उसकी सुबह होती गयी और बच्चा बड़ा होता गया...
वो बच्चे में व्यस्त होती गई और ये अपने काम में.!
घर की किस्त, गाड़ी की किस्त और बच्चे की ज़िम्मेदारी, उसकी शिक्षा और भविष्य की सुविधा और साथ ही बैंक में शून्य  बढ़ाने का टेंशन.!
उसने पूरी तरह से अपने आपको काम में झोंक दिया.!
बच्चे का स्कूल में एॅडमिशन हुआ और वह बड़ा होने लगा.!
उसका पूरा समय बच्चे के साथ बीतने लगा.!

इतने में वो पैंतीस का हो गया.!
खूद का घर, गाड़ी और बैंक में कई सारे शून्य.!
फिर भी कुछ कमी है..?
पर वो क्या है समझ में नहीं आता..!
इस तरह उसकी चिड़-चिड़ बढ़ती जाती है और ये भी उदासीन रहने लगता है।

दिन पर दिन बीतते गए, बच्चा बड़ा होता गया और उसका खुद का एक संसार तैयार हो गया.! उसकी दसवीं आई और चली गयी.!
तब तक दोनों ही चालीस के हो गए.!
बैंक में शून्य बढ़ता ही जा रहा है.!

एक नितांत एकांत क्षण में उसे वो गुज़रे दिन याद आते हैं और वो मौका देखकर उससे कहता है,
"अरे ज़रा यहां आओ,
पास बैठो.!"
चलो फिर एक बार हाथों में हाथ ले कर बातें करें, कहीं घूम के आएं...! उसने अजीब नज़रों से उसको देखा और कहती है,
"तुम्हें कभी भी कुछ भी सूझता है. मुझे ढेर सा काम पड़ा है और तुम्हें बातों की सूझ रही है..!" कमर में पल्लू खोंस कर वो निकल जाती है.!

और फिर आता है पैंतालीसवां साल,
आंखों पर चश्मा लग गया,
बाल अपना काला रंग छोड़ने लगे,
दिमाग में कुछ उलझनें शुरू हो जाती हैं,
बेटा अब काॅलेज में है,
बैंक में शून्य बढ़ रहे हैं, उसने अपना नाम कीर्तन मंडली में डाल दिया और...

बेटे का कालेज खत्म हो गया,
अपने पैरों पर खड़ा हो गया.!
अब उसके पर फूट गये और वो एक दिन परदेस उड़ गया...!!!

अब उसके बालों का काला रंग और कभी कभी दिमाग भी साथ छोड़ने लगा...!
उसे भी चश्मा लग गया.!
अब वो उसे उम्र दराज़ लगने लगी क्योंकि वो खुद भी बूढ़ा  हो रहा था..!

पचपन के बाद साठ की ओर बढ़ना शुरू हो गया.!
बैंक में अब कितने शून्य हो गए,
उसे कुछ खबर नहीं है. बाहर आने जाने के कार्यक्रम अपने आप बंद होने लगे..!

गोली-दवाइयों का दिन और समय निश्चित होने लगा.!
डाॅक्टरों की तारीखें भी तय होने लगीं.!
बच्चे बड़े होंगे....
ये सोचकर लिया गया घर भी अब बोझ लगने लगा.
बच्चे कब वापस आएंगे,
अब बस यही हाथ रह गया था.!

और फिर वो एक दिन आता है.!
वो सोफे पर लेटा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था.!
वो शाम की दिया-बाती कर रही थी.!
वो देख रही थी कि वो सोफे पर लेटा है.!
इतने में फोन की घंटी बजी,
उसने लपक के फोन उठाया,
उस तरफ बेटा था.!
बेटा अपनी शादी की जानकारी देता है और बताता है कि अब वह परदेस में ही रहेगा..!
उसने बेटे से बैंक के शून्य के बारे में क्या करना यह पूछा..?
अब चूंकि विदेश के शून्य की तुलना में उसके शून्य बेटे के लिये शून्य हैं इसलिए उसने पिता को सलाह दी..!"
एक काम करिये, इन पैसों का ट्रस्ट बनाकर वृद्धाश्रम को दे दीजिए और खुद भी वहीं रहिये.!"
कुछ औपचारिक बातें करके बेटे ने फोन रख दिया..!

वो पुनः सोफे पर आ कर बैठ गया. उसकी भी दिया बाती खत्म होने आई थी.
उसने उसे आवाज़ दी,
"चलो आज फिर हाथों में हाथ ले के बातें करें.!"
वो तुरंत बोली,
"बस अभी आई.!"
उसे विश्वास नहीं हुआ,
चेहरा खुशी से चमक उठा,
आंखें भर आईं,
उसकी आंखों से गिरने लगे और गाल भीग गए,
अचानक आंखों की चमक फीकी हो गई और वो निस्तेज हो गया..!!

उसने शेष पूजा की और उसके पास आ कर बैठ गई, कहा,
"बोलो क्या बोल रहे थे.?"
पर उसने कुछ नहीं कहा.!
उसने उसके शरीर को छू कर देखा, शरीर बिल्कुल ठंडा पड़ गया था और वो एकटक उसे देख रहा था..!

क्षण भर को वो शून्य हो गई,
"क्या करूं" उसे समझ में नहीं आया..!
लेकिन एक-दो मिनट में ही वो चैतन्य हो गई,  धीरे से उठी और पूजाघर में गई.!
एक अगरबत्ती जलाई और ईश्वर को प्रणाम किया और फिर से सोफे पे आकर बैठ गई..!

उसका ठंडा हाथ हाथों में लिया और बोली,
"चलो कहां घूमने जाना है और क्या बातें करनी हैं तम्हे.!"
बोलो...!! ऐसा कहते हुए उसकी आँखें भर आईं..!
वो एकटक उसे देखती रही,
आंखों से अश्रुधारा बह निकली.!
उसका सिर उसके कंधों पर गिर गया.!
ठंडी हवा का धीमा झोंका अभी भी चल रहा था....!!

यही जिंदगी है...??
नहीं....!!!
बिल्कुल नहीं !!!!
इसे ऐसा ना बनने दे..... कहती हैं हमारी चतुर नार, जीवन सिर्फ एक बार मिलता हैं , इसे भरपूर जीये ।

1.संसाधनों का अधिक संचय न करें
2.ज्यादा चिंता न करें
3. अच्छे वक़्त के इंतज़ार में ना बैठे
4. जीवनसाथी का हाथ पकड़ने के लिये एकांत    पलों को ना ढ़ुंढ़े, जब आपका मन करे, प्यार        जताइये
5.परिस्थिति कैसी भी हो, एक दुजे का साथ कभी ना छोड़े
6. इस भ्रम मे ना रहे कि आपके बच्चें आपकी सेवा करेंगे,बदलते ज़माने के साथ बदलिये
7. अकेले रहने और अकेले घुमने की आदत डालिये क्योकि जिन्दगी की राह बच्चों के भरोसे नही कटेगी
8.नयी पीढ़ी को दोष ना दे, उनके साथ तालमेल बैठाने की कोशिश करे
9.जवानी के दिनों को याद करके ना रोये.... अगर जवानी एक बार आती हैं तो बुढ़ापा भी एक ही बार आता हैं....इसे भी ज़िन्दादिली से जीये
10.हर पल को जीयो  और अपने लिए जियो, वक्त निकालो..!
       सुख दुख आने ही हैं,यह नियम हैं ,बस दोनो में संतुलन बना रहे क्योकि वक्त तो बदलता रहता हैं.........
बस, मन में रखे सुव्यवस्थित जीवन की कामना...!!
जीवन आपका है, जीना आपने ही है...!!

Saturday, May 28, 2016

सुंदरता

सुंदरता

एक राजा को अपने लिए सेवक की आवश्यकता थी। उसके मंत्री ने दो दिनों के बाद एक योग्य व्यक्ति को राजा के सामने पेश किया। राजा ने उसे अपना सेवक बना तो लिया, पर बाद में मंत्री से कहा, 'वैसे तो यह आदमी ठीक है पर इसका रंग-रूप अच्छा नहीं है।' मंत्री को यह बात अजीब लगी पर वह चुप रहा। एक बार गर्मी के मौसम में राजा ने उस सेवक को पानी लाने के लिए कहा। सेवक सोने के पात्र में पानी लेकर आया। लेकिन राजा ने जब पानी पिया तो पानी पीने में थोड़ा गर्म लगा। राजा ने कुल्ला करके फेंक दिया। वह बोला, 'इतना गर्म पानी, वह भी गर्मी के इस मौसम में, तुम्हें इतनी भी समझ नहीं।' मंत्री यह सब देख रहा था।

मंत्री ने उस सेवक को मिट्टी के पात्र में पानी लाने को कहा। राजा ने यह पानी पीकर तृप्ति का अनुभव किया। मंत्री ने राजा से पूछा, 'महाराज, सोने के पात्र का पानी आपको अच्छा नहीं लगा। लेकिन मिट्टी के पात्र का पानी क्यों अच्छा लगा?' राजा मौन रहा। इस पर मंत्री ने कहा, 'महाराज, बाहर को नहीं, भीतर को देखें। सोने का पात्र सुंदर, मूल्यवान और अच्छा है, लेकिन शीतलता प्रदान करने का गुण इसमें नहीं है। मिट्टी का पात्र अत्यंत साधारण है, लेकिन इसमें ठंडा बना देने की क्षमता है। कोरे रंग-रूप को न देखकर, गुण को देखें।' उस दिन से राजा का नजरिया बदल गया।
    चाणक्य ने भी कहा हैं कि मनुष्य गुणों से उत्तम बनता हैं,ओहदे से नहीं।तन की सुंदरता पहली नजर में किसी को भी लुभा सकती हैं लेकिन मन की सुंदरता अपनी छाप छोड़ देती हैं।माना कि सुंदरता आकर्षित करती हैं और मौकें भी दिलाती हैं..... लेकिन इसका समय सीमित होता हैं,बाहरी सुंदरता क्षणिक भ्रम होता है जो उम्र के साथ ढ़ल जायेगा, लेकिन अगर आपका मन निष्कपट हैं,आप चिन्ता नहीं चिन्तन करते हैं तो उसका ओज आपके चेहरे पर झलकेगा और सालों साल आपको युवा और उर्जामय रखेगा। क्या फायदा ऐसी सुंदरता का जिसमे स्वार्थ और दंभ की बू आती हो । तीखे नैन नक्श हमे सुंदर नहीं बनाते बल्कि हमारी सोच,हमारे तौर तरीके,हमारा व्यवहार हमे सुंदर बनाते हैं..........इसलिये बाहरी सुंदरता की बजाय आंतरिक सुंदरता का पोषण आवश्यक हैं । चतुर नार तो सदैव ही मन की सुंदरता के महत्व को जानती बुझती आयी हैं........

 1. मुखौटा लगाने की कोशिश ना करे,अपनी सोच और अपने विचारों का स्तर बढ़ाये ।
 2. मेकअप से अपनी खामियों को ना छुपाये बल्कि अपने गुणों से अपने व्यक्तित्व को मुखर बनाये।
 3. बी ओरिजनल...... जैसे हैं वैसे रहे,सरल बने जटिल नहीं।
 4. कुछेक लोग होते हैं जो गोरे रंग और सुंदर शरीर को प्राथमिकता देते हैं,ऐसे लोगो से दुरी बनाईये क्योकि ऐसे लोगो को समझाना समय नष्ट करने जैसा हैं।
 5. मन के सरल और परिपक्व समझ वाले लोगो के साथ अपना दायरा बढ़ाये,ये गजब का असर करता है,ये मेरी निजी राय हैं..... परिपक्व और गहरी सोच वाले लोग हमारे व्यक्तित्व को एक दिशा देते हैं।
 6. परिस्थीति कैसी भी हो संयम बनाये रखे।
 7. जिन्दगी रोज सबक सीखाती हैं, सो रोज सीखते रहे ।
 8. अच्छी कहानियाँ पढ़े, कविताएँ पढ़े, फिल्म देखे, घुमने जाये..... वो सब काम करे जो आपके मन को खुशी दे क्योकि दुखी मन में ही दुखी विचार आते हैं।
 9. हो सके तो कभी कभार गीता जरुर पढ़े, धार्मिक पुस्तक के रूप में नहीं जीवन का पाठ सीखाने वाली सर्वश्रेष्ठ किताब के रूप में...... और इसकी गुढ़ता को समझने की कोशिश करे ।
 10. अगर गीता के अध्याय समझ में ना रहे हो तो उपर वाले पॉईंट को दिमाग से निकाल दे😉,बिना गुढ़ता के भी जिन्दगी जी सकते हैं..... नॉट टु वरी... बी ईजी ☺️
 11. सुकरात बेहद कुरूप थे, लेकिन उनकी सीखायी बातें आज भी अमर हैं.....
 12. तन की सुंदरता को आईने मापा करते है जबकि मन की सुंदरता दिलों से मापी जाती हैं।
 13. शारीरिक बनावट किसी भी इंसान की पहचान नहीं हो सकती,उसकी पहचान उसके मन,उसके गुणों और स्वभाव से होती हैं।
 14. अपनेआप को बाहर से सुंदर बनाने के साथ अंदर से भी सुंदर बनाये,जब चेहरे पर फेशियल कराये तो तनिक मन की मलीनता को भी हटा दे...... चमक आ जायेगी चेहरे पर... रियली ।
 15. किसी का भरोसा ना तोड़े,ना कुछ गलत करे और ना ही गलत में सहयोग दे।
 16. अपने व्यवहार को सुंदर बनाये,लोगो से मुस्कुरा कर मिले,लोगो की मदद करे और उनकी खुशियों में शामील हो।
 17. खुले मन से लोगो को सराहे,क्योकि किसी की कामयाबी को पचाना हर किसी के बस की बात नहीं..... लोगो की सफलता पर तालीयाँ बजाना सीखिये।
 18. ऐसा कोई काम ना करे कि आपके मन की खूबसूरती ढ़क जाये।
           
                चतुर नार का कहना हैं कि कभी आत्मचिन्तन करके देखियेगा कि आपका मन कितना सुंदर है
' मन मलीन तन सुंदर कैसे। विष रस भरे कनक घट जैसे।'

Tuesday, May 3, 2016

तोल मोल के बोल

             जिस तरह मौन एक साधना हैं,उसी तरह बोलना भी एक कला हैं। दोनो का अपना अपना महत्व हैं और दोनो का ही उचित प्रयोग हमारे व्यक्तित्व को मुखर बनाता हैं । कहते हैं ना कि कमान से निकला तीर और ज़बान से निकला शब्द कभी लौट नहीं सकते,इसलिये अतिआवश्यक हैं कि हम पहले शब्दों को तोले फिर बोले।
                        कब बोलना हैं और कब नहीं बोलना हैं, अगर यह हमे समझ आ जाये तो कई तरह के फ़सादों से हम बच जायेंगे।अक्सर होता हैं कि हमारी जबान फिसल जाती है और हम गलत समय पर कुछ गलत बोल देते हैं,फिर बाद में पछताते हैं कि काश हमने ना बोला होता।ऐसा हम सबके साथ होता हैं,लेकिन हमे ऐसी बातों से सबक लेना चाहिये और अपनी ज़बान पर लगाम लगाना सीखना चाहिये ।
              वही दूसरी ओर मैंने ऐसे भी लोग देखे हैं जो जानबूझ कर कड़वे शब्दों का प्रयोग करते हैं ,सिर्फ दुसरों को आहत करने के लिये और स्वयं को खरी खरी कहने वाला सिद्ध करते हैं । ऐसे लोग खरी खोटी सुनाकर सिर्फ अपनी भड़ास निकालते हैं। किसी को भी बात बात पर टोकना इनकी आदतों में शुमार होता हैं और कहते हैं कि तुम्हारे भले के लिये टोकते हैं।
               कुछ लोग होते हैं जो बहुत मीठा बोलते हैं,उनके शब्द सीधे गुड़ की फैक्ट्री से आते हैं......अतिमिठास,जिसे सुन कर ही चाटुकारिता का संदेह हो जाता हैं,कम से कम मैं तो ऐसे लोगो को तुरंत भाँप जाती हूँ,एक बार मैंने लिखा भी था......
                              मैं आहत होती हूँ
                            अपनों के रुखे व्यवहार से नहीं
                            बल्कि
                           चाशनी में लिपटी उनकी बातों से ।
    ऐसा नहीं हैं कि मैं बहुत नापतोल के बोलती हूँ,बहुत बार गलत बोलती हूँ,बहुत बार बोलने में जल्दबाजी करती हूँ(जोकि मेरी एक बुरी आदत हैं), कई बार बोलने में अति कर जाती हूँ और अति तो विनाश का कारण हैं ही, लेकिन बोलना हर बार मुझे सीख देता हैं।
        सुधरने की राह पर हम भी हैं, तो चलिये देखते हैं आज चतुर नार के पिटारे से क्या निकलेगा क्योकि इस बार चतुर नार ने होमवर्क ज्यादा किया हैं,गुगल बाबा ने कई बेहतरीन दोहे उपलब्ध कराये है-

1. सधे और सभ्य शब्द आपको लोकप्रिय बनायेंगे।
2. बेवजह तारीफ के पुलींदे मन बाँधीये,बुरा मत बोलिये लेकिन झुठी तारीफ करके अगले को भ्रम में ना डाले।
3. अगर आपका कोई अपना पीड़ा में हैं तो अपने शब्दों से उसकी पीड़ा कम करने का प्रयत्न करे अन्यथा चुप ही रहे,श्रेयस्कर होगा ।
4. किसी बीमार व्यक्ति से मिलने जा रहे हैं तो उसकी बीमारी की गम्भीरता का वर्णन तो कतई ना करे,ना ही ये बखान करे करे कि फलां फलां ने इस बीमारी में ऐसा ऐसा किया था,क्योकि हरेक की परिस्थिति भिन्न होती हैं।
5. किसी परेशान को उचित राह दिखाये लेकिन अपनी राय थोपे नहीं।
6. कठोर शब्दों का प्रयोग कतई ना करे,ऐसे शब्दों को सुनना सामने वाले की मजबूरी हो सकती है लेकिन आप अपना दंभ और सामर्थ्य शब्दों से ना दर्शाये,याद रखिये वक्त सभी का बदलता है।
                    तुलसी मीठे वचन ते,सुख उपजे चहुं ओर।
                     वशीकरण यह मंत्र है,तजीये वचन कठोर ।

   7.   अपने शब्दों से किसी का हौंसलां बढ़ाईये,नई राह दिखाये,घावों का मरहम बने ना कि कटु वचन कहकर दुखती रग को और अधिक गहरा बनाये ध्यान रखे-
                                शब्द' 'शब्द' सब कोई कहे,
                                      'शब्द' के हाथ न पांव;

                                   एक 'शब्द' 'औषधि" करे,
                            और एक 'शब्द' करे 'सौ' 'घाव"...!

8. अपनी बातचीत में सम्माननीय शब्दों से बड़ों को सम्मान दे ,अगर कोई असंगत परम्परा आपको उचित नहीं लगती तो तर्कसंगत उदाहरण देकर सभ्य शब्दों मे विरोध दर्ज कराये और जरुरी नहीं कि आप हर बात माने क्योकि कोई रीति कुरीति भी बन जाती है,तब उसे त्यागना ही श्रेष्ठ होता है, बदलाव लाने के लिये कभी कभी संस्कारों का ज़ामा उतारना जरुरी होता हैं।चतुर नार का मानना हैं कि तर्कसंगत शब्द कभी आपकी छवि को बुरा नहीं बनायेंगे।
9. किसी ओर का इंतजार मत करिये कि वो आपकी लड़ाई लड़े,अपने शब्दों को अपनी ताकत बनाये।
10. छोटों को समझाये, डांटे लेकिन प्यार से,अगर बच्चें भी तर्कसंगत उदाहरण देते हैं,आपको बदलने के लिये, तो जल्दबाजी में विरोध करने की बजाय तनिक सोचे,बच्चों के नजरिये से और चल पड़िये बदलाव की राह पर,क्योकि हम किसी को बदलना चाहते हैं तो हमे भी कही ना कही तो बदलना ही पड़ेगा। सोचिये जरा !
11. मित्र से नाराजगी हैं तो कटु ना बने ,उससे नाराजगी दिखाये क्योकि आपके मित्र पर आपका हक बनता हैं।उसे उलाहने देकर प्यार जताये ना कि ताने मारकर नफरत-
                         ऐसी वाणी बोलिये,मन का आपा खोय
                         औरन को शीतल करै,आपहु शीतल होय

12. ज्ञान बांटते ना फिरे ना ही बेवजह की बहस में हिस्सा ले,अपने आपको आकर्षण का केन्द्र बनाने के चक्कर में चापलुसी ना करे।
13. किसी की भी छवि को बिगाड़ने के लिये या फिर मात्र अपनी ईर्ष्या की आग को शांत करने के लिये अपशब्दों का प्रयोग ना करे।
14. आपके आस पास या आपके परिवार में ही किसी ने कुछ बहुत अच्छा किया हैं तो उसे अहसास कराये कि वो वाकई काबिले तारीफ़ है,यकिन मानिये आपका कद नीचा नहीं होगा बल्कि आप बड़प्पन ही महसूस करेंगे।
15. किसी की तारीफ़ नहीं कर सकते तो कम से कम टांग मत खींचीये क्योकि चतुर नार का मानना है कि अक्सर लोग जब किसी की सफलता पचा नहीं पाते तो किसी ओर की सफलता को बढ़ा चढ़ा कर बताते हैं या फिर अच्छी किस्मत बता कर उसकी सफलता पर पानी फेर देते हैं।
16. अपने अंह की संतुष्टी मात्र के लिये अपनी कठोर जबान से बेवजह बहस कर किसी को नीचा ना दिखाये
                           

                                           प्रभू' को भी पसंद नहीं
                                                 'सख्ती' 'बयान' में,
                                  इसी लिए 'हड्डी' नहीं दी, 'जबान' में.

17. आपके बोल ही आपका मोल कराते हैं,ऐसा बोलिये कि कोई एक बार आपसे मिल ले तो आपके व्यक्तित्व की छाप उस पर पड़ जाये।चतुर नार गुगल बाबा के सौजन्य से कहती है-
                   जग ने मुझको सीख दी,तोल मोल के बोल
                  अब मैं बोलू तोल के , लोग कहे अनमोल ।